02 July 2016 Murli

English

Essence: Sweet children, donate the vices and the omens of the eclipse of Rahu will be removed. Make a donation and the eclipse will be removed.

Question: What awareness does the Father, the Lord of the Tree, give you children of Bharat in order to bring about the omens of Jupiter?
Answer: O children of Bharat, your original eternal deity religion was extremely elevated. You were full of all virtues, sixteen celestial degrees full. You children of Mine, the Ocean, have become ugly by sitting on the pyre of lust and become eclipsed. I have now come to make you beautiful once again.

Song: Salutations to Shiva!

Essence for dharna:
1. In order to go from this world of thorns to the garden of flowers, remove all the thorns (vices). Remember with a lot of love the Father who makes you divine.
2. Make effort in this benevolent confluence age to change from shudras to Brahmins and become deities. In order to remove the omens of the eclipse of Rahu, donate the vices.

Blessing: May you be an elevated effort-maker who uses the word “effort” accurately and moves constantly forward.
Sometimes, the word “effort-maker” becomes a very good shield when you are being defeated or made a failure. Whenever someone makes a mistakes, he says, “I am still an effort-maker”. However, a true effort-maker would never be defeated because the real meaning of the word “effort” is to move along considering yourself to be the “being”, that is, the soul. Effort-makers who stay in the soul-conscious stage always move along while keeping their destination in front of them. They never stop or lose their courage or enthusiasm.

Slogan: Maintain the awareness of being a master almighty authority; this awareness reminds you of your being a master.

Hindi

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – तुम विकारों का दान दे दो तो राहू का ग्रहण उतर जायेगा, दे दान तो छूटे ग्रहण”
प्रश्न:- वृक्षपति बाप अपने भारतवासी बच्चों पर ब्रहस्पति की दशा बिठाने के लिए कौन सी स्मृति दिलाते हैं?
उत्तर:- हे भारतवासी बच्चों, तुम्हारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म अति श्रेष्ठ था। तुम सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण थे। तुम मुझ सागर के बच्चे काम चिता पर बैठ काले हो गये हो, ग्रहण लग गया है। अब मैं तुम्हें फिर से गोरा बनाने आया हूँ।
गीत:- ओम् नमो शिवाए…
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) इस कांटों की दुनिया से फूलों के बगीचे में जाने के लिए जो भी कांटे (विकार) हैं, उन्हें निकाल देना है। पारस बनाने वाले बाप को बड़े प्यार से याद करना है।
2) इस कल्याणकारी संगमयुग पर शूद्र से ब्राह्मण सो देवता बनने का पुरूषार्थ करना है। राहू के ग्रहण को उतारने के लिए विकारों को दान देना है।
वरदान:- पुरूषार्थ शब्द को यथार्थ रीति से यूज कर सदा आगे बढ़ने वाले श्रेष्ठ पुरूषार्थी भव
कई बार पुरूषार्थी शब्द भी हार खाने में वा असफलता प्राप्त होने में अच्छी ढाल बन जाता है, जब कोई भी गलती होती है तो कह देते हो हम तो अभी पुरूषार्थी हैं। लेकिन यथार्थ पुरूषार्थी कभी हार नहीं खा सकते क्योंकि पुरूषार्थ शब्द का यथार्थ अर्थ है स्वयं को पुरूष अर्थात् आत्मा समझकर चलना। ऐसे आत्मिक स्थिति में रहने वाले पुरूषार्थी तो सदैव मंजिल को सामने रखते हुए चलते हैं, वे कभी रूकते नहीं, हिम्मत उल्लास छोड़ते नहीं।
स्लोगन:- मास्टर सर्वशक्तिवान् की स्मृति में रहो, यह स्मृति ही मालिकपन की स्मृति दिलाती है।

Comments

comments