29 May 2015 Murli

English

Essence: Sweet children, Baba has come to enable you to earn an imperishable income. You can now earn as many imperishable jewels of knowledge as you want.

Question: What special effort is required to change devilish sanskars into divine sanskars?
Answer: In order to change your sanskars, practise remaining soul conscious as much as possible. Devilish sanskars are created by you coming into body consciousness. The Father has come to change your devilish sanskars into divine sanskars. Make this effort: First, I am a soul, and then there is this body.

Song: You wasted the night in sleeping and the day in eating.

Essence for dharna:
1. You have to reach your karmateet stage by having unadulterated love for the one Father. Have unlimited disinterest in this old world and old bodies.
2. Do not perform any actions against the Father’s directions. Never be defeated on the battlefield. Become doubly non-violent.

Blessing: May you be an elevated server who checks even your thoughts and finishes your account of waste.
An elevated server is one whose every thought is powerful. Let not a single thought of yours go to waste because a server means one who acts on the stage of the world. The whole world copies you. If you waste even one thought, then you have not wasted it just for yourself but you also became an instrument for the waste of others. Therefore, finish the account of waste and become an elevated server.

Slogan: Together with creating an atmosphere for service, also make the atmosphere one of an unlimited attitude of disinterest.

Hindi

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – बाबा आया है तुम बच्चों को अविनाशी कमाई कराने, अभी तुम ज्ञान रत्नों की जितनी कमाई करने चाहो कर सकते हो”
प्रश्न:- आसुरी संस्कारों को बदलकर दैवी संस्कार बनाने के लिए कौन-सा विशेष पुरूषार्थ चाहिए?
उत्तर:- संस्कारों को बदलने के लिए जितना हो सके देही-अभिमानी रहने का अभ्यास करो। देह-अभिमान में आने से ही आसुरी संस्कार बनते हैं। बाप आसुरी संस्कारों को दैवी संस्कार बनाने के लिए आये हैं, पुरूषार्थ करो पहले मैं देही आत्मा हूँ, पीछे यह शरीर है।
गीत:- तूने रात गँवाई सो के ………….
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक बाप से अव्यभिचारी प्रीत रखते-रखते कर्मातीत अवस्था को पाना है। इस पुरानी देह और पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य हो।
2) कोई भी कर्तव्य बाप के डायरेक्शन के विरूद्ध नहीं करना है। युद्ध के मैदान में कभी भी हार नहीं खानी है। डबल आहिंसक बनना है।
वरदान:- संकल्प को भी चेक कर व्यर्थ के खाते को समाप्त करने वाले श्रेष्ठ सेवाधारी भव
श्रेष्ठ सेवाधारी वह है जिसका हर संकल्प पावरफुल हो। एक भी संकल्प कहाँ भी व्यर्थ न जाए। क्योंकि सेवाधारी अर्थात् विश्व की स्टेज पर एक्ट करने वाले। सारी विश्व आपको कॉपी करती है, यदि आपने एक संकल्प व्यर्थ किया तो सिर्फ अपने प्रति नहीं किया लेकिन अनेकों के निमित्त बन गये इसलिए अब व्यर्थ के खाते को समाप्त कर श्रेष्ठ सेवाधारी बनो।
स्लोगन:- सेवा के वायुमण्डल के साथ बेहद के वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल बनाओ।

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