19 July 2017 Murli

English

Essence: Sweet children, you now have to remove devilish defects and imbibe Godly virtues. Claim self-sovereignty for 21 births from the Father.

Question: Which of the Father’s acts should also be your acts?
Answer: The Father’s act is to teach everyone knowledge and yoga. You children must also perform this act. You have to purify the impure. Your business is to do spiritual service. Some children leave their bodies but then take new bodies and carry on with this effort. Day by day, your service will continue to increase.

Song: Salutations to Shiva.

Essence for dharna: 
1. Awaken at amrit vela and remember the Father with a lot of love and make effort to be soul conscious. Remove the rust of vices with the power of remembrance.
2. Whilst staying in your household, take the course to become like a lotus flower. Feel each one’s pulse and see their keenness and then give knowledge.

Blessing: May you be an incognito effort-maker who remains constantly content and makes others content when forming connections and relationships with them.
The confluence age is the age of contentment. If you do not remain content at the confluence age, then when would you remain content? Therefore, neither let there be any type of conflict within yourself nor let there be any type of conflict in your connections with others. A garland is created when one bead comes into contact with another bead. Therefore, when you remain constantly content and you make others content when in relationship and connection with them, you will then become the beads of the garland. To be in a family means to remain constantly content and make others content.

Slogan: Those who renounce even a trace of their old nature and sanskars are full renunciates.

Hindi

“मीठे बच्चे – पहले हर एक को यह मन्त्र कूट-कूट कर पक्का कराओ कि तुम आत्मा हो, तुम्हें बाप को याद करना है, याद से ही पाप कटेंगे”
प्रश्न:- सच्ची सेवा क्या है, जो तुम अभी कर रहे हो?
उत्तर:- भारत जो पतित बन गया है, उसे पावन बनाना-यही सच्ची सेवा है। लोग पूछते हैं तुम भारत की क्या सेवा करते हो? तुम उन्हें बताओ कि हम श्रीमत पर भारत की वह रूहानी सेवा करते हैं जिससे भारत डबल सिरताज बनें। भारत में जो पीस प्रासपर्टी थी, उसकी हम स्थापना कर रहे हैं।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने के लिए अन्दर बाबा-बाबा की उछल आती रहे। हठ से नहीं, रूचि से बाप को चलते-फिरते याद करो। बुद्धि सब तरफ से हटाकर एक में लगाओ।
2) जैसे बाप प्यार का सागर है, ऐसे बाप समान प्यार का सागर बनना है। सब पर उपकार करना है। बाप की याद में रहना और सबको बाप की याद दिलाना है।
वरदान:- साइलेन्स के साधनों द्वारा माया को दूर से पहचान कर भगाने वाले मायाजीत भव
माया तो लास्ट घड़ी तक आयेगी लेकिन माया का काम है आना और आपका काम है दूर से भगाना। माया आवे और आपको हिलाये फिर आप भगाओ, यह भी टाइम वेस्ट हुआ। इसलिए साइलेन्स के साधनों से आप दूर से ही पहचान लो कि ये माया है। उसे पास में आने न दो। अगर सोचते हो क्या करूं, कैसे करूं, अभी तो पुरूषार्थी हूँ …तो यह भी माया की खातिरी करते हो, फिर तंग होते हो इसलिए दूर से ही परखकर भगा दो तो मायाजीत बन जायेंगे।
स्लोगन:- श्रेष्ठ भाग्य की रेखाओं को इमर्ज करो तो पुराने संस्कारों की रेखायें मर्ज हो जायेंगी।

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